Indore collector office mein ek yuva apni maa ki pension aur sunwai ko lekar bhavuk hote hue, gareeb ki awaaz uthata hua – dimagkibati.comab system sunta nahi, tab gareeb ko awaaz buland karni padti hai.” 📍 Indore Collector Office | dimagkibati.com

इंदौर (मध्य प्रदेश): Indor Viral Video

देश में जनसुनवाई को आम आदमी की आवाज सुनने का सबसे बड़ा मंच माना जाता है, लेकिन जब यही मंच लोगों की उम्मीदें तोड़ने लगे, तो सवाल उठना लाज़मी है। मध्य प्रदेश के इंदौर जिले से सामने आया एक ऐसा ही मामला इन दिनों चर्चा में है। इंदौर कलेक्टर कार्यालय के भीतर एक युवक का भावुक और आक्रोशित दृश्य सामने आया, जिसमें वह प्रशासन से सवाल करता नजर आता है—

“गरीब की सुनवाई आखिर कहां होती है?”

यह सवाल सिर्फ एक युवक का नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की आवाज बन गया है जो सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते-लगाते थक चुके हैं।


🔴 क्या है पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार, यह युवक इंदौर जिले का निवासी है और वह अपनी मां की पेंशन से जुड़ी समस्या को लेकर लंबे समय से परेशान था। युवक का आरोप है कि उसकी मां की पेंशन बिना किसी स्पष्ट कारण के रोक दी गई थी। इसके अलावा, सरकारी रिकॉर्ड और वोटर लिस्ट से नाम हटने जैसी समस्याएं भी सामने आई थीं।

युवक का कहना है कि वह कई बार जनसुनवाई कार्यक्रम में अपनी शिकायत दर्ज करवा चुका था, लेकिन हर बार उसे सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं। बार-बार की अनदेखी और लगातार बढ़ती परेशानियों ने उसे अंदर से तोड़ दिया, जिसका नतीजा कलेक्टर कार्यालय में सामने आया।


🏛️ कलेक्टर ऑफिस में क्यों भड़का युवक?

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, युवक जब कलेक्टर कार्यालय पहुंचा तो वह पहले से ही मानसिक दबाव में था। जैसे ही उसे फिर से टालने की कोशिश की गई, उसका गुस्सा फूट पड़ा। वह जोर-जोर से अपनी बात रखने लगा और प्रशासन से सवाल करने लगा।

युवक ने कहा कि वह गरीब है, उसके पास कोई सिफारिश नहीं है और न ही वह किसी बड़े नेता को जानता है। उसकी सिर्फ एक ही मांग है—न्याय और सुनवाई।


🗣️ जनता की प्रतिक्रिया

इस घटनाक्रम के सामने आने के बाद आम लोगों में नाराज़गी देखी गई। कई लोगों का कहना है कि अगर समय रहते गरीबों की समस्याओं का समाधान किया जाए, तो उन्हें इस तरह अपनी बात उठाने पर मजबूर नहीं होना पड़े।

एक व्यक्ति ने कहा,
“अगर सिस्टम सही होता, तो किसी को इस तरह चिल्लाना नहीं पड़ता।”

वहीं एक अन्य ने कहा,
“जनसुनवाई सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गई है।”


🏢 प्रशासन ने क्या कहा?

मामले के सामने आने के बाद जिला प्रशासन ने शिकायत का संज्ञान लिया। प्रशासन की ओर से बताया गया कि युवक की मां की रुकी हुई पेंशन को फिर से चालू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

प्रशासन का कहना है कि मामला तकनीकी कारणों से अटका हुआ था और अब इसे जल्द सुलझा लिया जाएगा।


❓ क्या आम आदमी की सुनवाई इतनी मुश्किल है?

यह घटना एक बार फिर इस सवाल को जन्म देती है कि क्या बिना संघर्ष और दबाव के आम आदमी को न्याय मिल पाता है?
क्या गरीब व्यक्ति को अपनी समस्या के समाधान के लिए हर बार खुद को साबित करना पड़ेगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जनसुनवाई व्यवस्था सही ढंग से काम करे, तो ऐसे हालात पैदा ही न हों।


📊 जनसुनवाई व्यवस्था पर सवाल

  • शिकायत दर्ज होती है, समाधान नहीं

  • तारीख मिलती है, नतीजा नहीं

  • आश्वासन मिलता है, कार्रवाई नहीं

यही कारण है कि लोगों का भरोसा धीरे-धीरे सिस्टम से उठता जा रहा है।


🧠 विशेषज्ञों की राय

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है। देशभर में हजारों लोग पेंशन, राशन कार्ड, वोटर आईडी और अन्य सरकारी योजनाओं से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे हैं।

उनका मानना है कि प्रशासन को गरीब और बुजुर्ग लोगों के मामलों में ज्यादा संवेदनशील और जवाबदेह होने की जरूरत है।


✍️ निष्कर्ष

इंदौर कलेक्टर कार्यालय में हुआ यह घटनाक्रम सिस्टम की खामियों को उजागर करता है। अगर समय रहते लोगों की समस्याओं का समाधान किया जाए, तो उन्हें इस तरह दफ्तरों में अपनी आवाज बुलंद करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

“गरीब की सुनवाई कहां है?”
यह सवाल आज सिर्फ इंदौर का नहीं, बल्कि पूरे देश की व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता

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